पंचायत राज मंत्री के अपने ही विधानसभा क्षेत्र में पंचायत राज व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
पंचायत राज मंत्री के अपने ही विधानसभा क्षेत्र में पंचायत राज व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। खेराबाद पंचायत समिति में विकास अधिकारी समयसिंह मीणा पर नियम-कायदों को दरकिनार कर ऐसे निर्णय लेने का आरोप है, जिससे प्रधान और प्रशासनिक समिति की भूमिका लगभग समाप्त हो गई है। इसे लोकतांत्रिक मूल्यों और जनप्रतिनिधियों के अधिकारों पर सीधा हमला माना जा रहा है।सूत्रों के अनुसार, ग्राम विकास अधिकारियों के स्थानांतरण जैसे महत्वपूर्ण मामलों में प्रशासनिक समिति की बैठक आवश्यक होती है, जिसकी अध्यक्ष प्रधान स्वयं होती हैं। आरोप है कि बिना ऐसी बैठक बुलाए ही तबादलों के आदेश जारी कर दिए गए, जो न केवल नियमों का उल्लंघन है बल्कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का खुला अपमान भी है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि प्रदेश में भाजपा की सरकार और पंचायत राज मंत्री इसी क्षेत्र से होने के बावजूद भाजपा के ही जनप्रतिनिधि स्वयं को असहाय क्यों महसूस कर रहे हैं। स्थानीय राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि विकास अधिकारी को इतना मजबूत संरक्षण प्राप्त है कि जनप्रतिनिधियों की आपत्तियों और नाराजगी का उन पर कोई असर नहीं होता, जिससे पंचायत समिति में असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है।विकास अधिकारी समयसिंह मीणा का नाम पहले भी विभिन्न विवादों और शिकायतों में चर्चा का विषय रहा है, जिनमें कर्मचारियों से विवाद, कार्यप्रणाली पर सवाल, मनरेगा भुगतान संबंधी शिकायतें और कथित अनियमितताओं के आरोप शामिल हैं। क्षेत्र में कथित ‘कूलर घोटाले’ को लेकर भी बातें होती रही हैं, बावजूद इसके अधिकारी का प्रभाव कम होता नहीं दिख रहा। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा तेज है कि लगातार विवादों में रहने के बावजूद अधिकारी किस संरक्षण के चलते अपनी कुर्सी पर मजबूती से जमे हुए हैं। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह सब पंचायत राज मंत्री की जानकारी में हो रहा है? यदि हां, तो कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही, और यदि नहीं, तो क्या संबंधित अधिकारी मंत्री की राजनीतिक साख को ही चुनौती दे रहा है। खेराबाद का यह मामला अब केवल एक पंचायत समिति का विवाद नहीं रहा, बल्कि यह जनप्रतिनिधियों के अधिकार बनाम नौकरशाही के वर्चस्व की लड़ाई बन गया है। जनता जानना चाहती है कि पंचायत राज व्यवस्था में अंतिम निर्णय जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों का चलेगा या अधिकारियों की मनमर्जी का। यदि समय रहते स्थिति नहीं सुधरी, तो यह संदेश जाएगा कि पंचायत राज मंत्री के अपने ही क्षेत्र में लोकतंत्र सबसे कमजोर है और जनप्रतिनिधियों की भूमिका सिर्फ नाम मात्र की रह गई है। जनता और जनप्रतिनिधि दोनों ही इस सवाल का जवाब चाहते हैं कि आखिर मंत्री जी कब तक मौन रहेंगे।
