कोरोना काल में बच्चों काे ऐसा नुकसान जिसकी भरपाई नहीं आसान, क्या कहते हैं यूनीसेफ के आंकड़े
कोरोना काल में बच्चों काे ऐसा नुकसान जिसकी भरपाई नहीं आसान, क्या कहते हैं यूनीसेफ के आंकड़े। पिछले करीब दो वर्षों से महामारी के कारण दुनिया भर में शिक्षा प्रभावित रही है। सीखने समझने के नुकसान के साथ-साथ स्कूलों के बंद होने का असर बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है। इस नुकसान को पूरा करने के लिए बच्चों को काफी मदद की जरुरत होगी साथ ही उनके सामाजिक विकास और पोषण को भी ध्यान में रखना होगा।कोविड-19 महामारी के चलते दुनिया भर में जिस तरह से पूर्ण या आंशिक रुप से स्कूल बंद करने पड़े हैं उससे दुनिया भर में करीब 63.5 करोड़ बच्चों की शिक्षा प्रभावित हुई है। यह जानकारी हाल यूनिसेफ द्वारा साझा नवीनतम आंकड़ों में सामने आई है। गौरतलब है कि पिछले करीब दो वर्षों से महामारी के कारण शिक्षा प्रभावित रही है। इन व्यवधानों से बच्चों में बुनियादी जोड़-घटा और पढ़ने-लिखने के कौशल पर असर पड़ा है। वैश्विक स्तर पर शिक्षा में आए व्यवधान का मतलब है कि लाखों बच्चे उस स्कूली शिक्षा से वंचित रह गए थे, जो उन्हें कक्षा में होने पर मिलती। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा छोटे और कमजोर वर्ग से सम्बन्ध रखने वाले बच्चों को सबसे ज्यादा हुआ है।स्कूलों के बंद होने के कारण निम्न और मध्यम आय वाले देशों में सीखने का जो नुकसान हुआ है उसे देखें तो जहां महामारी से पहले इन देशों में 10 वर्ष की उम्र के 53 फीसदी बच्चे अपने पाठ को पढ़ने या समझने में असमर्थ थे वो प्रतिशत अब बढ़कर 70 पर पहुंच चुका है। यदि इथियोपिया से जुड़े आंकड़ों को देखें तो वहां प्राथमिक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे व्यवधान के चलते सामान्य से केवल 30 से 40 फीसदी ही गणित सीख पाए थे।इसी तरह महामारी से पहले जहां ब्राजील के कई राज्यों में दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले आधे बच्चे पढ़ने में असमर्थ थे वो आंकड़ा बढ़कर 75 फीसदी पर पहुंच गया था। वहीं ब्राजील में 10 से 15 वर्ष की उम्र के हर दसवें बच्चे की मंशा स्कूल खुलने के बाद वापस स्कूल जाने की नहीं थी। यदि दक्षिण अफ्रीका से जुड़े आंकड़ों की देखें तो मार्च 2020 से जुलाई 2021 के बीच करीब 4 से 5 लाख बच्चों ने कथित तौर पर स्कूल छोड़ दिया था।समय बीतने के साथ-साथ स्कूलों के बंद होने का असर भी बढ़ता जा रहा है। सीखने समझने के नुकसान के साथ-साथ स्कूलों के बंद होने का असर बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है। इसके कारण पोषण के नियमित स्रोत तक उनकी पहुंच कम हो गई है और उनके उत्पीड़न का खतरा भी बढ़ गया है।
