आत्म-समर्पण की दहलीज पर लोकतंत्र: क्या प्रबुद्ध वर्ग मौन रहेगा
आत्म-समर्पण की दहलीज पर लोकतंत्र: क्या प्रबुद्ध वर्ग मौन रहेगा?
भारतीय लोकतंत्र आज चौराहे पर नहीं, बल्कि आत्म-समर्पण की दहलीज पर खड़ा है। प्रेस की स्वतंत्रता पर बढ़ते संगठित दबाव, मीडिया मालिकों की वैचारिक अधीनता, और राज्य द्वारा स्थापित किए जा रहे डिजिटल निगरानी तंत्र (जैसे ‘संचार साथी’ ऐप की अनिवार्यता) स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं कि देश एक अधिनायकवादी (Authoritarian) दिशा में तेज़ी से बढ़ रहा है। यह केवल राजनीतिक दलों के बीच का संघर्ष नहीं है; यह नागरिक स्वतंत्रता (Civil Liberties) और लोकतांत्रिक चेतना का अस्तित्वगत संकट है।
1. मीडिया: लोकतंत्र का पतन-बिन्दु
प्रेस की स्वतंत्रता, जिसे संविधान का ‘पहला संशोधन’ और लोकतंत्र का ‘पहला प्रहरी’ कहा जाता है, आज सबसे कमज़ोर है।
आंकड़ों की भयावहता: 2014 के बाद से प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 140वें स्थान से 161वें स्थान तक की गिरावट महज़ एक संख्या नहीं है; यह लाखों आलोचनात्मक आवाज़ों का गला घोंटना है। मालिक की कृपा: पत्रकारिता का मूल सिद्धांत है ‘ताकतवरों को जवाबदेह ठहराना’। लेकिन अब यह काम ‘आर्थिक और वैचारिक कृपा’ पर निर्भर हो गया है। जब मीडिया मालिक अपनी अन्य व्यावसायिक हितों या वैचारिक झुकाव के कारण आलोचनात्मक लेखों को सेंसर करते हैं, तो वे अपनी संस्था को लोकतंत्र के प्रहरी से बदलकर सत्ता के प्रचारक (Propagandist) में बदल देते हैं।दमन का संगठित स्वरूप: पत्रकारों के ख़िलाफ़ राजद्रोह, UAPA और ED/IT छापे का उपयोग, साथ ही कश्मीर में दफ्तरों को सील करना, दिखाता है कि दबाव व्यक्तिगत नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित, संस्थागत टूलकिट बन गया है। जब स्वतंत्र रूप से लिख पाना कठिन हो जाए, तो कलम तोड़ देना ही विकल्प बचता है।
2. डिजिटल स्वतंत्रता पर ‘राज्य का हाथ’
‘संचार साथी’ ऐप को अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टॉल करने का सरकारी आदेश एक प्रशासनिक कदम से कहीं अधिक है।
सहमति का हनन: निजता के दौर में, उपयोगकर्ता को एक ‘अडिलीट’ (Undeletable) ऐप रखने के लिए मजबूर करना, ‘अर्थपूर्ण सहमति’ (Meaningful Consent) के लोकतांत्रिक सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है।
निगरानी की ओर पहला कदम: भले ही उद्देश्य साइबर सुरक्षा हो, लेकिन यह कदम नागरिकों की निजी डेटा और संचार पर राज्य की पहुँच को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाता है। इतिहास गवाह है कि नियंत्रणकारी शक्तियाँ, सुरक्षा के नाम पर स्थापित किए गए उपकरणों का उपयोग अंततः राजनीतिक निगरानी के लिए करती हैं। यह ‘सुरक्षित भारत’ नहीं, बल्कि ‘नियंत्रित भारत’ की ओर ले जाता है।
3. प्रबुद्ध वर्ग की मौन सहमति: सबसे बड़ा संकट
लोकतंत्र का पतन तब नहीं होता जब सरकार अत्याचारी हो जाती है, बल्कि तब होता है जब प्रबुद्ध वर्ग मौन हो जाता है।
विद्वानों की तटस्थता: विश्वविद्यालयों, थिंक टैंकों और सिविल सोसाइटी में मौजूद शिक्षित एवं विचारक वर्ग की चुप्पी आज के संकट का सबसे चिंताजनक पहलू है। डर (Fear) और सुविधावाद (Convenience) ने तटस्थता का रूप ले लिया है। कई प्रबुद्धजन या तो सत्ता की आलोचना से बचते हैं या उसे ‘राजनीतिक शोर’ कहकर ख़ारिज कर देते हैं।
अधिसूचित नागरिक का दायित्व: लोकतंत्र को बनाए रखने का बोझ केवल पत्रकारों या विपक्षी नेताओं पर नहीं है। यह प्रत्येक अधिसूचित नागरिक का दायित्व है। जब प्रेस स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकता, जब चुनाव में फर्जी मतदाताओं के आरोप लगते हैं, और जब संवैधानिक संस्थाओं में अविश्वास बढ़ता है, तब प्रबुद्ध वर्ग का मौन रहना अधिनायकवाद को हरी झंडी देने जैसा है।
4. जागृति की आवश्यकता
प्रबुद्ध वर्ग को जागृत करने के लिए निम्नलिखित कठोर सत्यों का सामना करना आवश्यक है:
1. आप सुरक्षित नहीं हैं: आज पत्रकार जेल जा रहे हैं, कल आलोचना करने वाला कोई भी नागरिक जा सकता है। डिजिटल नियंत्रण के दायरे में, आपकी निजी बातचीत और विचार सुरक्षित नहीं रहेंगे।
2. यह केवल राजनीति नहीं है: मीडिया का पतन अर्थव्यवस्था, सामाजिक न्याय और शिक्षा जैसे हर क्षेत्र को प्रभावित करता है, क्योंकि असत्य और प्रचार के माहौल में कोई भी सार्थक सुधार संभव नहीं है।
3. विरोध ज़रूरी है, लेकिन रचनात्मक: मौन तोड़कर संवैधानिक मर्यादा के भीतर रचनात्मक विरोध और सवाल उठाना अनिवार्य है। मीडिया की स्वतंत्रता की मांग को केवल ‘पत्रकारिता’ का मुद्दा न मानकर ‘नागरिक स्वतंत्रता’ का मुद्दा बनाना होगा।
भारत में लोकतंत्र और मीडिया की दशा और दिशा दोनों ही अत्यंत चिंताजनक हैं। यदि देश का प्रबुद्ध वर्ग इस गंभीर पतन को महज़ तटस्थता से देखता रहा, तो यह लोकतंत्र धीरे-धीरे अधिनायकवाद के अँधेरे में समा जाएगा। स्वतंत्रता की विदाई को चुपचाप स्वीकार करने के बजाय, इस संकट की घड़ी में प्रबुद्ध वर्ग को अपनी चेतना और आवाज़ का प्रयोग करना चाहिए। मौन की कीमत बहुत भारी होगी।
