अमेरिका अपने युद्धों को हार या जीत पर खत्म नहीं करता, बल्कि केवल अपने फायदे पर समाप्त करता है। इसके पीछे वह ऐसी भयंकर तबाही छोड़ जाता
अमेरिका अपने युद्धों को हार या जीत पर खत्म नहीं करता, बल्कि केवल अपने फायदे पर समाप्त करता है। इसके पीछे वह ऐसी भयंकर तबाही छोड़ जाता है, जिससे उबरने में कई पीढ़ियों को संघर्ष करना पड़ता है। जापान की तबाही एक ऐतिहासिक उदाहरण है, वहीं वियतनाम आज तक अमेरिकी बमों से जूझ रहा है, जहाँ बरसों पहले गिराए गए बारूद के धमाके शायद 200 साल और होते रहेंगे। अफगानिस्तान की जनता के लिए बंदूक के साये से बाहर निकलना मुश्किल है, और इराक एक ऐसा उजाड़ा हुआ देश है जहाँ जीवन सिसक रहा है। अमेरिका इन सबकी परवाह किए बिना अपनी कीमत वसूल कर आगे बढ़ जाता है।ईरान के पास अपनी परमाणु सनक को छोड़कर आगे बढ़ने का अवसर था, लेकिन IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) को निरंकुश ताकत की लत लगी हुई थी। उन्हें दूसरों का कुछ बिगाड़ने की बजाय केवल अपनी ही आवाम को कुचलने का हक चाहिए था। इसी का नतीजा है कि ईरान एक बार फिर जल उठा है।आज तेहरान का हर कोना धुएं की चादर से ढका हुआ है। कल से अब तक सिर्फ तेहरान पर 200 टॉमहॉक मिसाइलें गिरी हैं, हवाई हमले इसके अतिरिक्त हैं। तेहरान में मौत बरस रही है, और अगर यही हाल दो दिन और रहा तो तेहरान गाज़ा बन जाएगा। अमेरिका को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि वहाँ सारे ईरानी खत्म हो जाएं, क्योंकि वह तेल और व्यापार मार्ग के नियंत्रण तथा अन्य देशों से व्यापारिक वसूली के जरिए अपने खर्च से 100 गुना अधिक वसूल लेगा। ईरान बाकी दुनिया से कहीं पीछे घिसटकर, अपाहिज होकर जियेगा।
