भारतीय संविधान और आज के जनप्रतिनिधि
भारतीय संविधान और आज के जनप्रतिनिधि
दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी भारत में है और भारत का संविधान सर्वधर्म के ग्रंथों से ऊपर है भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र और सबको अपने अपने धर्म को मानने की स्वतंत्रता है अभिव्यक्ति की आजादी है हर प्रकार के अधिकार भारतीय संविधान में जनता के लिए उनके उज्जवल भविष्य के लिए दिए गए हैं पर हम अपने अधिकारों की तो बात करते हैं पर कर्तव्यों को भूल जाते हैं जबकि हमें अधिकार और कर्तव्य दोनों का ख्याल रखना चाहिए बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधान लिखने से पहले तमाम देशों के संविधानो को पढ़ा विचार-विमर्श किया और उन्हें जो चीजें भारत की जनता के लिए उनके उत्थान के लिए अच्छी थी उनको भारतीय संविधान में रखा चाहे वह भारत शासन अधिनियम 1935 या अन्य अधिनियम संविधान बनाते समय धर्म पर भी चर्चा हुई उस समय धर्म को लेकर 68 लोगों ने धर्म का उल्लंघन किया और 41 लोगों ने इसका सपोर्ट किया था यानी कि अधिकांश लोग ऐसे थे जो धर्म पर विश्वास नहीं रखते थे वह मानव के हित और कल्याण के उद्धार के लिए हर प्रकार के रास्ते संविधान के माध्यम से खोज रहे थे संविधान सौंपते समय बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि मेरे देश के दलित पिछड़े आदिवासी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों संविधान के माध्यम से आपके तमाम प्रकार के रास्ते खोल दिए हैं संविधान बहुत खूबसूरत है लेकिन उनको चलाने वाले लोगों की नियत साफ होनी चाहिए तभी आप का भला हो पाएगा जनता के हित और कल्याण के लिए संविधान में भी समय-समय पर तमाम प्रकार के संशोधन हुए लेकिन वर्तमान की सरकार संविधान के प्रति कुछ अच्छा रवैया अपना नहीं रही है इसलिए जाति धर्म के नाम पर देश के तमाम लोगों को लड़ाने का काम कर रही है और हमारे जनप्रतिनिधि भी अपना अपना नाम कमाने के लिए तमाम प्रकार के उल्टे सीधे बयान देते रहते हैं संविधान में बताया गया कि शासन के तीन अंग है विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका लेकिन वर्तमान में तीनों में आपसी सामंजस्य स्थापित नहीं दिखाई दे रहा है और इसका खामियाजा देश के सबसे निचले पायदान पर बैठे हुए उन गरीब तबकों को भुगतना पड़ रहा है जो हमेशा जुल्म और जाति का शिकार है संविधान बनाते समय हमारे शिल्पकारों ने कोई भूल नहीं की लेकिन आज उसको चलाने वाले जनप्रतिनिधि आए दिन तमाम प्रकार की गलतियां कर रहे हैं संविधान कहता है कि समाज के अंतिम पायदान पर बैठा व्यक्ति संविधान के माध्यम से अपने जीवन को सशक्त बना सकता है संविधान हमारे देश का आधारभूत ग्रंथ है हमें अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का भी ध्यान देना चाहिए सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार तो न्यायपालिका में ही है 2019 में तकरीबन 30 करोड़ ऐसे लोग थे जिन्होंने मतदान नहीं किया इस पर भी विचार विमर्श होना चाहिए, विगत 20 वर्षों का इतिहास देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट के ऐसे व्यक्ति जज बने हैं जिनके दादा जी पिताजी जच रहे हैं और उन्हें ही जज बनाया जा रहा है सुप्रीम कोर्ट में ही सबसे ज्यादा परिवारवाद हावी है इस पर भी विचार विमर्श होना चाहिए, ढाई करोड़ से ज्यादा केस न्यायालय में विचाराधीन है और लोग अपनी जमीनी बेचकर न्याय पाने की उम्मीद में बरसों से भटक रहे इस पर भी विचार होना चाहिए और यह विचार कोई और नहीं संसद को करने की आवश्यकता है क्योंकि इस देश के करोड़ों करोड़ों लोग विश्वास और आस्था के साथ वोट करते हैं कि हमारे जनप्रतिनिधि हमारे हक और अधिकार की बात करेंगे पर हमारी भी कहीं न कहीं गलती है हम ऐसे लोगों को जनप्रतिनिधि बना लेते हैं जिन्हें वहां बोलने का सलीका ही नहीं होता और हमारे प्रतिनिधि बन जाते हैं क्योंकि हम उनके लालच में आकर फस जाते हैं और जिन्हें कुछ आता है वह जनप्रतिनिधि अपने स्वार्थ के लिए हमारे हित के बारे में कुछ बोलना नहीं चाहते हैं और जो बोल रहे हैं उन पर वही लोग टिप्पणियां उठा रहे हैं तीनों अंगों के बीच एक संतुलन होना चाहिए इस संतुलन को बिगाड़ने का काम केवल न्यायपालिका कर रही है यह लोकतंत्र में अतिक्रमण जैसा है न्यायपालिका के पीछे घूंघट है और वह इस घूंघट को उतारना नहीं चाहती सभी धर्मों में महिलाओं के अधिकारों को सीमित किया गया है समय-समय पर जब भी महिलाओं के उत्थान की बात आई है तब तक इस देश में विरोध हुआ है चाहे विधवा विवाह हो सती प्रथा हो चाहे आज सिविल कोर्ट यूनिफॉर्म का बिल हो कुछ मुट्ठी भर धर्म के ठेकेदार धार्मिक नेता विरोध कर रहे हैं बाकी सब यूनिफॉर्म सिविल कोर्ट के सपोर्ट में उन्हें लगता है कि सबको बराबरी के अधिकार मिल जाएंगे तो उनकी धर्म की दुकानें बंद हो जाएंगी संविधान की प्रस्तावना के अनुसार भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है कहने का आशय यह है कि शासन की शक्ति किसी व्यक्ति में नहीं भारत की जनता में निहित है और जनता अपने प्रतिनिधि का चुनाव करती है हर व्यक्ति को अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की आजादी है यदि किसी किताब में दलित, पिछड़े, मुसलमानों, महिलाओं के बारे में गलत लिखा गया है तो उसका विरोध करने की आवश्यकता है चाहे वह मनुस्मृति हो या रामचरितमानस या अन्य ग्रंथ क्योंकि जब संविधान में संशोधन हो सकता है तो इसमें भी संशोधन होना चाहिए स्वामी प्रसाद मौर्य उत्तर प्रदेश, चंद्रशेखर बिहार और राजेंद्र पाल गौतम दिल्ली ने मंच और मीडिया के माध्यम से कुछ कहा है तो जरूर सोच समझकर ही कहां होगा क्योंकि वह इस देश के जाने-माने सीनियर नेताओं में अपनी ख्याति बनाए हुए और यह सब ऐसे नेता हैं जो बहुजन समाज की राजनीति से उभरे हैं बहुजन समाज के तमाम उन नेताओं से मैं गुजारिश करता हूं कि सामने आकर सच बोलने का साहस रखें और धर्म के ठेकेदारों जाति के नाम पर राजनीति करने वाले जनप्रतिनिधियों का खुलकर विरोध करें ताकि देश की जनता को न्याय मिल सके सम्मान और स्वाभिमान के साथ जी सकें , देश के उज्जवल भविष्य का रास्ता संविधान के माध्यम से ही गुजरता है किसी धार्मिक ग्रंथ से नहीं और मैं पूर्णतया भारतीय संविधान के शिल्पकारो को हृदय से आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने सबकी तरक्की के लिए इतना खूबसूरत भारतीय संविधान दिया…
एडवोकेट सुरेंद्र कुमार आजाद सिविल कोर्ट लखीमपुर खीरी
