सीनियर आई, ए, एस संजय कुमार ने आखिर क्या सन्देश दे दिया सम्पूर्ण मानव जाति के लिए
सीनियर आई, ए, एस संजय कुमार ने आखिर क्या सन्देश दे दिया सम्पूर्ण मानव जाति के लिए
सहारनपुर मानसिकता समाचार के सम्पादक डी, सी,मुदगल के साथ एक अनोपचारिक वार्ता में सीनियर आई, ए, एस आफिसर श्री संजय कुमार ने अपने हृदय में छिपे प्रकृति से अटूट प्रेम को प्रकट कर ही दिया जब उन्होंने प्रकृति को अपनी (बड़ी माँ ) कहकर सम्बोधित किया अपने व्यक्तव्य में उन्होंने प्रकट किया कि प्रकृति माँ ने ही हम सब की उत्पत्ति की है । हमारी माता ने हमें जन्म दिया किन्तु प्रकृति ने ही हमारी जन्मदाती माता के भीतर अपने बच्चों के प्रति अगाथ प्रेम,त्याग औऱ बलिदान जैसे गुण सृजित किये । उसने मानव जाति के लिए स्वर्ग समान सुन्दर पृथ्वी जैसा ग्रह प्रदान किया । जिसमें रहकर प्राणी प्रकृति की खूबसूरत रचना को निहारे और उसके आनन्द की अनुभूति प्राप्त कर सके प्रकृति ने प्राणी को आवश्यकता की प्रत्येक वस्तु उपलब्ध कराई किन्तु जब जब प्राणी ने इसकी उपेक्षा की – वह स्वयं की ही निर्मित विपदाओं का शिकार होता चला गया । आधुनिकता के वशीभूत होकर मानव जाति इससे विमुख होती चली जा रही है । अप्राकृतिक सुख ,साधनों की ओर अन्धों की भाँति आँखे मूँदकर दौड़ती चली जा रही है एवम आर्टिफिशियल सजावट की ओर आकर्षित हो रही है ।उन्होंने कहा कि मानव जाति को पुनः प्रकृति की ओर मुड़ना पड़ेगा । यदि मानव जाति ने इसकी उपेक्षा की तो मानव जाति को इसका दुष्परिणाम भी भोगना होगा । वह स्वयं ही नहीं ,वरन इस सुन्दर धरती के समस्त प्राणी, जीव-जन्तुओं के पतन का उत्तरदायी होगा । यह दोष सिर्फ और सिर्फ मानव जाति का ही होगा । जिससे प्रकृति माँ का हृदय विदीर्ण होगा । जिसके क्षणिक क्रोध को भी मनुष्य झेल नहीं पायेगा आज मनुष्य अन्धा होकर प्रकृति से खिलवाड़ करने पर आमादा है व इसकी रचनाओं को नष्ट-भ्रष्ट करने पर तुला हुआ है । परिणामस्वरूप मानव के दुष्कर्मो का खुमियाज उन भोले भाले जीव-जन्तुओं को अपने प्राण देकर चुकाना पड़ रहा है जिनका कोई दोष नहीं है । मानव की इस अन्धी दौड़ ने ही पर्यावरण को दूषित किया है एवं प्रदूषण की बहुतायत उत्पत्ति की है। जिसके कारण असँख्य निर्दोष जीव,जन्तुओं की हत्यायें हुईं है तथा यह क्रम जारी है । अनेक प्रजातियाँ लुप्त हो गयी है लेकिन मानव इस कुकृत्य के लिए अपने आप को दोषी मानने को कतई तैयार नहीं है ।अनावश्यक पेड़ों के कटान, स्वच्छ एवं पवित्र नदियों को अनेको प्रकार से दूषित करना, तालाबों आदि पर अतिक्रमण कर उनको पाट देना आदि कहाँ तक जायज है ? इसको “विकास” की संज्ञा दी जाये अथवा “विनाश” की ? हमें स्वयं में ही इसका आंकलन करना होगा ।प्रश्न यह है कि विश्व हमें किस महत्वाकांक्षा की ओर ले जा रहा है ?उन्होंने मानव जाति को चेताते हुए कहा कि मानव उन अप्रत्याशित विपत्तियों से कतई अन्जान है जो उसके आने वाली पीढ़ियों को भुगतनी पड़ेंगी जिनके लिए वह शुभ की कामना करता है । यह कल्पना करना भी मुश्किल होगा कि मानव अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए रोग,भय,द्वेष,अल्पायु आदि अनेक संकट अपनी विरासत के रूप में छोड़ जायेगा । यदि मनुष्य आज भी जाग जाएगा और स्वार्थी होने के बजाय आने वाली पीढ़ी हेतु सुख समृद्धि की कामना करता है तो उसे आज ही -अभी ही सोचना होगा और कुछ करना होगा जो वास्तविक पुण्य की शृंखला का एक हिस्सा है सम्पादक श्री मुदगल जी स्तब्ध व इस वार्ता की अन्तरात्मा में प्रवेश कर भाव विभोर होकर माननीय सीनियर आई, ए,एस श्री संजय कुमार जी से उक्त संवाद को समाज हित में प्रकाशित करने का अनुग्रह करने लगे तब संजय जी ने कहा कि मैं तो अपनी अभिव्यक्ति दे चुका हूँ यदि उचित है तो मैं आपको अपने विवेक पर स्वतन्त्र कर रहा हूँ ।
